Akhil Bhartiya Digamber Jain Yuvak - Yuvakti Parichay Sammelen Bhopal
 
जैन बन्धुओं से अपील

      1998 को सकुशल सम्पन्न हुआ। दोनों के दो-दो बच्चे हो गये हैं। दोनों परिवार सुखी हैं। थोड़ी बहुत ऊँच-नीच तो एक सामान्य प्रक्रिया है, जो अपने ही सम्बंधियों द्वारा हो जाती है। हम और हमारे समधी दोनों प्रस न्न हैं। यदि हम मांग कर 2 या 4 लाख ले भी लेते तो क्या होता? हमें को्इ भी कमी नजर नहीं आयी। इसी अनुभव का लाभ आप सभी को बांटकर, एक विचारधारा का अंकुरण करना चाहता हूँ जिससे अधिक से अधिक संबंध कुशलता पूर्वक, खुशी-खुशी के माहौल में सम्पन्न हो सकें। यही मेरी आप सभी से विनय है, अपील है। मैंने स्वयं इस शुभ विचार पर कदम बढ़ाकर, आपको कदम उठाने के लिये प्रेरित करने का एक तुच्छ प्रयास किया है। यह एक अपील कर रहा हूँ, बाकी सब तो आपको ही सोचना है कि आप मेरी बात माने या न मानें।

     उपसंहार : यह 100 प्रतिशत निश्चित है कि यदि लेन-देन के विचार को भूलकर सिर्फ आप यह सोच लें कि दहेज में वस्तुयें जो भी लड़की के माँ-बाप देना चाहें, उनकी भावना का आप स्वागत करें किन्तु न कद एवं स्वर्ण आभूषण के लिए उन्हें मजबूर न करें। नगद का तो परहेज ही कर लेवें, तो बाकी सभी बातें सामान्य हो जावेगी।

     आप एक बेटी के बाप ही है इस अभिप्राय से सोचें, एवं व्यावहारिक प्रेम भाव बनाकर संबंध करें तो इन परिचय सम्मेलनों से आप चौगुना लाभ उठा सकते हैं। अंत में चार लाइनें इस विशय पर प्रस्तुत हैं :-

'' चाहे आप लड़के के मां-बाप हों, या हों लड़की के मां-बाप,
सिर्फ इतना याद रखें कि, बच्चों का संबंध होवे अपने आप।
दोनों एक-दूसरे को पसंद कर लेवें, तो आप लगादें अपनी मुहर,
फिर देखिये खुशियाँ दौड़ेगी, सभी परिवार में होगी प्रसन्नता की लहर। ''


लेखक :
प्रेमचन्द जैन
से.नि. प्राचार्य, शा.पी.जी. महाविधालय, इटारसी 
वर्तमान - 341, रोहित नगर, फेज - आई, ई-8 एक्सटेंषन
भोपाल   पिन-462039 मो. 9826046593